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रविवार, 17 जुलाई 2011

गंगा {सुमित्रानंदन पंत }

अब आधा जल निश्चल, पीला, -
आधा जल चंचल औ', नीला -
गीले तन पर मृदु संध्यातप
सिमटा रेशम पट-सा ढीला!
ऐसे सोने के साँझ प्रात,
ऐसे चाँदी के दिवस रात,
ले जाती बहा कहाँ गंगा
जीवन के युग-क्षण - किसे ज्ञात!
विश्रुत हिम पर्वत से निर्गत,
किरणोज्ज्वल चल कल उर्मि निरत,
यमुना गोमती आदी से मिल
होती यह सागर में परिणत।
यह भौगोलिक गंगा परिचित,
जिसके तट पर बहु नगर प्रथित,
इस जड़ गंगा से मिली हुई
जन गंगा एक और जीवित!
वह विष्णुपदी, शिवमौलि स्रुता,
वह भीष्म प्रसू औ' जह्न सुता,
वह देव निम्नगा, स्वर्गंगा,
वह सगर पुत्र तारिणी श्रुता।
वह गंगा, यह केवल छाया,
वह लोक चेतना, यह माया,
वह आत्मवाहिनी ज्योति सरी,
यह भू पतिता, कंचुक काया।
वह गंगा जन मन से नि:सृत,
जिसमें बहु बुदबुद युग निर्तित,
वह आज तरंगित संसृति के
मृत सैकत को करने प्लावित।
दिशि दिशि का जन मन वाहित कर,
वह बनी अकूल अतल सागर,
भर देगी दिशि पल पुलिनों में
वह नव नव जीवन की मृदु उर्वर!
अब नभ पर रेखा शशि शोभित
गंगा का जल श्यामल कंपित,
लहरों पर चाँदी की किरणें
करती प्रकाशमय कुछ अंकित!

अविच्छिन्न {सुमित्रानंदन पंत }

हे करुणाकर, करुणा सागर!

क्यो इतनी दुर्बलताओं का
दीप शून्य गृह मानव अंतर!
दैन्य पराभव आशंका की
छाया से विदीर्ण चिर जर्जर!

चीर हृदय के तम का गह्वर
स्वर्ण स्वप्न जो आते बाहर
गाते वे किस भाँति प्रीति
आशा के गीत प्रतीति से मुखर?

तुम अपनी आभा में छिपकर
दुर्बल मनुज बने क्यों कातर!
यदि अनंत कुछ इस जग में
वह मानव का दारिद्रय भयंकर!

अखिल ज्ञान संकल्प मनोबल
पलक मारते होते ओझल,
केवल रह जाता अथाह नैराश्य,
क्षोभ संघर्ष निरंतर!

देव पूर्ण निज रुपों में स्थित
पशु प्रसन्न जीवन में सीमित,
मानव की सीमा अशांत
छूने असीम के छोर अनश्वर!

एक ज्योति का रूप यह तमस
कूप वारि सागर का अंभस्
यह उस जग का अंधकार
जिसमें शत तारा चंद्र दिवाकर!